सिविल सेवा के अभ्यर्थियों पर पुलिसिया कार्रवाई की निंदा हो रही है जो होनी भी चाहिए। कल को देश में महत्वपूर्ण दायित्त्व सँभालने जा रहे युवाओं पर इस प्रकार से लाठीचार्ज करना ठीक नहीं था। २०११ में जब सी-सैट लागू किया गया तब के नीति निर्माताओं ने जाने क्या सोच कर ये बनाया पर इतना तो तय है की वे जड़ से कटे हुए लोग थे जो गांवों, कस्बों और क्षेत्रीय भाषाओँ व लोगों से चिढते रहे होंगे और हिंदीभाषियों से इन्हें कोई लगाव नहीं रहा होगा। बहुत सम्भावना इस बात की भी है कि ये लोग अपने बीच से ही हों पर तंत्र में आने के बाद इन्हें अपने संघर्षपूर्ण अतीत से घृणा हो गयी हो और उसी प्रक्रिया में लगे लोगों के प्रति कोई सहानुभूति न रह गई हो। सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से क्लर्क नहीं नौकरशाह तैयार किए जाते हैं अतः ये सारे चोंचले बहुत आवश्यक नहीं थे। पूरी समस्या का दूसरा पक्ष ये है की उस समय इसके विरोध में कोई स्वर नहीं सुनाई दिया और स्वभाव से बहरी सत्ता ये मान बैठी की सब कुछ ठीक है। भूल उन लोगों की भी है जो समझौतावादी बन बैठे रहे और इस बात की प्रतीक्षा करते रहे की कोई कुछ करे तो अच्छा हो, अब अकस्मात् और रातों रात समस्या के समाधान की अपेक्षा की जा रही है जो सर्वथा अनुचित है। धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें, संयम ना खोएं, जो होगा अच्छा ही होगा . . . . .
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